तेरे शहर को तरक्की का गुरूर बड़ा है, देख मेरे गाँव पे सुकून का सुरूर चढ़ा है, पेट भरे दुनिया का फिर भी सादगी दिलों में, वहाँ सब मिलावटी फिर भी मगरुर बड़ा है। देखने को भीड़ बहुत है तेरे शहर में लेकिन, अंदर से हर शख्स दूजे से बड़ी दूर खड़ा है। हर कोई हर किसी को अँधेरे में रखता है वहां, कहने को चकाचौंध के लिए मशहूर बड़ा है। माना किताबें ज्यादा नहीं पढ़ी किसी ने यहाँ पर, बुजुर्गों के फलसफों से जिंदगी को जरूर पढ़ा है। ये वृद्धाश्रम का चलन भी तेरे शहर से चला है, यहां तो हर बुजुर्ग परिवार में कोहिनूर जड़ा है। जरूरत पड़ने पर पूरा गाँव साथ हो जाता है यहाँ, वहाँ ज़रूरत पे फायदा उठाने का दस्तूर बड़ा है। मसला यहां बैठ सुलझाते हैं बड़े मसले पँचायत में, वहाँ सालों बाद अदालत कहे कि बेकसूर लड़ा है। फिर सोचता हूँ अपनी जगह सब ठीक है ‘संदीप‘, – संदीप सिंह –