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Showing posts from July, 2022

बिन तेरे और तेरे साथ...

बिना तेरे किसी बेज़ान पत्थर सा पड़ा होता हूँ, और तुम साथ हो तो जैसे हीरे में जड़ा होता हूँ। मज़ा आता है लोगों के कलेजे जलते देखकर,  मैं जब भी महफ़िल में तुम्हारे साथ खड़ा होता हूँ।  तेरा रूठना कम्बख़त मौसम-ए-बहार भी पतझड़, और मैं पेड़ से किसी सूखे पत्ते सा झड़ा होता हूँ। एक तुम, जिसे हर बार जल्दी जाने की होती है, एक मैं, ''अभी न जाओ'' इसी ज़िद पे अड़ा होता हूँ। वो रात जब इन आँखों को दीदार नहीं होता तेरा, मैं पागल हर दफा मेरे ख्वाबों से लड़ा होता हूँ। बचाकर गर्म हवाओं से उसे रखता हूँ कुछ ऐसे, कि जो वो पानी हो तो मैं मिट्टी का घडा़ होता हूँ। -संदीप सिंह-

नशे दा कहर - Tragic Story of Many Families (Hindi/Punjabi)

बड़ा हो गया कुवेला (देर रात), हले घर नइयों आया, माड़े ओंदे ने ख्याल, जांदा दिल घबराया, बैठा सारा परिवार, ओहदी उड़ीक करी जावे, कित्थे-किवें होणा, पल-पल सोच मरी जावे।          बूहा (दरवाजा) पिट्टया किसे ने, बाहरों आवाज इक छड्डी,           ''ओ कोई खोलो दरवाजा'' कह के गाल (गाली) इक कड्डी,          कुंडा खोलया जो माँ ने, सामणे बुत्त जेहा खड़ा,           लै के बूहे दा सहारा, ओहदा पुत्त सीगा खड़ा।   नशे दा सी भार, खड़ा होया नी सी जा रिहा,  ओहनू वेख सबना दा, रोणा सीगा आ रिहा,  अक्खां खुली-बंद जेही, पैर धरती सी लब्ब (ढूंढ) रहे,   कदे उट्ठे  कदे   डिग्गे, बेबे-बापू ओहनू चक रहे।             औखा-सौखा होके, ठाके मंजे उत्ते पाया सी,           एह की कित्ता कहके, बापू छाती नाल लाया सी,          की कमी रही दस्स ,  ...