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Showing posts from August, 2022

आदाब से हिसाब तक..

नज़र-ए-करम हम पर कुछ ऐसी जनाब कर गए पास से गुज़रे और झुकी आँखों से आदाब कर गए, चेहरा उनका लगा गा़लिब की कोई गज़ल सा मुझे, सामने आए तो लब खुद-ब-खुद इरशाद कर गए।  ये नदी यूँ ही नहीं मदहोश सी बल खाए जा रही है, होठों से छुआ है, वो उसके पानी को शराब कर गए।  मैं चला था ओर उनकी, हौंसला तूफानों सा लेकर, आँखों में डुबोकर, मुझ समंदर को तालाब कर गए।  ख्वाबों में ही सही, मगर हाथ में हाथ था उनका, जो मैं न कर सका, वो काम मेरे ख़्वाब कर गए। उनके चेहरे के आगे चाँद भी फीका सा पड़ रहा है, बाकमाल नूर है वो हर तारे को आफ़ताब कर गए।  शिकायत थी कि इंतज़ार बहुत करवाया उसने 'संदीप' पर एक मुलाक़ात में वो सालों का हिसाब कर गए। - संदीप सिंह -

बात कल रात की

कल रात की ही बात है, मैं जा कर बिस्तर पर लेटा था, वहीं साथ ही नटखट सा मेरा 5 साल का बेटा था। लेटे-लेटे जब बाजू को मैंने एक तरफ कर रख दिया, वो आकर पास लेटा और मेरी बाजू पर सर रख दिया। भोली-भाली सी बातें करता, मेरे साथ खेलता रहा, कभी कान-नाक, कभी दाढ़ी-मूछों को छेड़ता रहा। मस्ती करता जाने कब वो अपने ख्वाबों में खो गया, मेरे सीने पे हाथ, पेट पे टांग रख लिपट कर सो गया। तभी हू-ब-हू ऐसी ही ज़हन में एक पुरानी बात आ गई, इस बाप को भी कल रात अपने बाप की याद आ गई। यादों का सिलसिला चल पडा़ पुरानी कड़ियाँ खुलने लगी, बेटे की हर बात जैसे मुझसे और मेरे पापा से जुड़ने लगी। याद आया कि पापा के साथ मेरा ऐसे ही सोना होता था, बाजू पर सर होता था वही मेरा तकिया-बिछौना होता था। अब जब भी इसे बाइक पर अपने आगे बिठाता हूँ , तो खुद को पापा की साइकिल पर आगे बैठा पाता हूँ। किसी शाम हाथ थामे जब जाता हूँ शहर के हरे मैदानों में, महसूस होता है पापा के साथ हूँ गाँव के खेत-खलिहानों में। एक तसवीर भी दिखी हम तीनों की, मानो चार चाँद ...