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Showing posts from May, 2023

तेरा शहर, मेरा गाँव

तेरे शहर को तरक्की का गुरूर बड़ा है, देख मेरे गाँव पे सुकून का सुरूर चढ़ा है, पेट भरे दुनिया का फिर भी सादगी दिलों में, वहाँ सब मिलावटी फिर भी मगरुर बड़ा है। देखने को भीड़ बहुत है तेरे शहर में लेकिन, अंदर से हर शख्स दूजे से बड़ी दूर खड़ा है। हर कोई हर किसी को अँधेरे में रखता है वहां, कहने को चकाचौंध के लिए मशहूर बड़ा है। माना किताबें ज्यादा नहीं पढ़ी किसी ने यहाँ पर, बुजुर्गों के फलसफों से जिंदगी को जरूर पढ़ा है। ये वृद्धाश्रम का चलन भी तेरे शहर से चला है, यहां तो हर बुजुर्ग परिवार में कोहिनूर जड़ा है। जरूरत पड़ने पर पूरा गाँव साथ हो जाता है यहाँ, वहाँ ज़रूरत पे फायदा उठाने का दस्तूर बड़ा है। मसला यहां बैठ सुलझाते हैं बड़े मसले पँचायत में, वहाँ सालों बाद अदालत कहे कि बेकसूर लड़ा है। फिर सोचता हूँ अपनी जगह सब ठीक है ‘संदीप‘, – संदीप सिंह –

तेरे रहनुमाँ बहुत हैं

माना कि  शहर में तेरे रहनुमाँ बहुत   हैं,  फिक्रमंद कम हैं और  खामखां बहुत  हैं पहरेदारी की फ़िक्र ना कर , ये  सब पे नजर रखते  हैं तुझे खुद खबर नहीं ये तेरी कितनी खबर रखते  हैं खुद के गम से नहीं ये तेरी हसीं से  परेशाँ  बहुत  हैं माना कि  शहर   में   तेरे   रहनुमाँ   बहुत   हैं                       नसीहत ना चाह कर लोगे, मुफ्त के कर्ज़दार बनोगे,                     मिला लो हाँ में हाँ इनकी, तो तुम समझदार बनोगे,                     सुनोगे  दिल की  तो कहेंगे,  अरे  तू नादाँ बहुत  हैं,                      माना कि  शहर   में   तेरे   रहनुमाँ ...

यह कैसा दौर है...

क्या दौर है जनाब, क्या क्या सामान बिक रहा है, ज़मीर बिक रहा है, ईमान बिक रहा है। सब कुछ यहाँ बिकाऊ , कीमत सही लगाओ,  चंद सिक्कों की खातिर इन्सान बिक रहा है।। मर कर दो गज़ के मालिक बने थे जो बमुश्किल, वो मुर्दे हैराँ हैं कि उनका शमशान बिक रहा है। हर रोज़ धर्म की नई, एक दुकान खुल रही है,  लेलो कि सस्ते दाम में भगवान बिक रहा है।। उस मुल्क की हिफाज़त खुदा भी न कर सकेगा,  जिस मुल्क की सरहद का निगेहबान बिक रहा है।  जिस मेज़ पर तिरंगा, उसी मेज़ के नीचे से,  अपनों के हाथों मेरा भारत महान बिक रहा है।।  अरबों का कर्जा खाकर, साहेब बैठे विदेश जाकर, यहां चंद हजार कर्जे में रोज़ किसान बिक रहा है। धूप, ठंड, बारिश, झेल कर उगाये फिर भी, रो-रो के उसका गेहूँ, मक्का, धान बिक रहा है।।   - संदीप सिंह -

एक चक्कर अस्पताल का

गम ज्यादा सताए तो खुदा के दर तो जरूर जाया करो, पर हो सके तो एक चक्कर अस्पताल लगा आया करो,                किसी कमरे में नई जिंदगी तुम्हे जन्म लेती दिखेगी,                 किसी बुजुर्ग की आखिरी सांसे जवाब देती दिखेगी,  कहीं कोई बेटा बीमार मां का ख्याल रख रहा होगा, हमारे साथ ही क्यों? हर कोई सवाल कर रहा होगा,                कोई बाप बेसुध बेटे को बाहों में उठाए खड़ा होगा,                कोई इलाज की खातिर बेदर्द गरीबी से लड़ा होगा, कोई आग में झुलसा, कोई सड़क हादसे का शिकार, किसी को दिल का दौरा, कोई दर्द ए दिल का बीमार,                थका कैंसर से लड़ कर आखिरी घड़ियां गिन रहा कोई,                ना रात रात लगे उसको, ना उसका अब दिन रहा कोई, खुदकुशी कर जिंदगी और मौत के बीच फंसा हुआ, हर कोई मिलेगा दवाइयों के दलदल में धंस...