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बात कल रात की




कल रात की ही बात है, मैं जा कर बिस्तर पर लेटा था,

वहीं साथ ही नटखट सा मेरा 5 साल का बेटा था।


लेटे-लेटे जब बाजू को मैंने एक तरफ कर रख दिया,

वो आकर पास लेटा और मेरी बाजू पर सर रख दिया।


भोली-भाली सी बातें करता, मेरे साथ खेलता रहा,

कभी कान-नाक, कभी दाढ़ी-मूछों को छेड़ता रहा।


मस्ती करता जाने कब वो अपने ख्वाबों में खो गया,

मेरे सीने पे हाथ, पेट पे टांग रख लिपट कर सो गया।


तभी हू-ब-हू ऐसी ही ज़हन में एक पुरानी बात आ गई,

इस बाप को भी कल रात अपने बाप की याद आ गई।


यादों का सिलसिला चल पडा़ पुरानी कड़ियाँ खुलने लगी,

बेटे की हर बात जैसे मुझसे और मेरे पापा से जुड़ने लगी।


याद आया कि पापा के साथ मेरा ऐसे ही सोना होता था,

बाजू पर सर होता था वही मेरा तकिया-बिछौना होता था।


अब जब भी इसे बाइक पर अपने आगे बिठाता हूँ ,

तो खुद को पापा की साइकिल पर आगे बैठा पाता हूँ।


किसी शाम हाथ थामे जब जाता हूँ शहर के हरे मैदानों में,

महसूस होता है पापा के साथ हूँ गाँव के खेत-खलिहानों में।


एक तसवीर भी दिखी हम तीनों की, मानो चार चाँद जड़े थे,

दादा की बाहों में पोता लगे, जैसे मुझे ही गोद में लिए खड़े थे।


जब लाड करें वो पोते से, तो वो गज़ब नज़ारा होता है,

सच कहा है कि मूल से ज्यादा ब्याज़ प्यारा होता है।


ख़ुशी और गम से अब आँखे थोड़ी नम पड़ने लगी थी,

क्या क्या याद करता पूरी रात भी कम पड़ने लगी थी।


फिर यादों की लगाम खींच, आखिर मैं नींदों में खो गया,

ख्वाब में मैं भी, पापा की बाजु पे सर रख कर सो गया।।


- संदीप सिंह -

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