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Showing posts from April, 2023

ये बात ठीक नहीं

पहचान बनाओ तो खुद की मेहनत से, खैरात से बने हस्ती, ये बात ठीक नहीं। छोटे घर को महज़ बड़ा मकान बनाने को, उजाड़ दो कोई बस्ती, ये बात ठीक नहीं। बात जब भी करो तो दिल से किया करो, रिश्तों में ज़बरदस्ती, ये बात ठीक नहीं। समंदर डुबा दे, गम नहीं, ये हक है उसका, साहिल पे डूबे कश्ती, ये बात ठीक नहीं। दिल बहलाने को ज़माने में चीजें बहुत हैं लेकिन, किसी मजबूर से करो मस्ती, ये बात ठीक नहीं। शौंक बड़े ठीक हैं, पर दिल भी तो बड़ा रखो, बातें महंगी, नीयत सस्ती, ये बात ठीक नहीं। माना कि मोहब्बत में दूरियों का भी मजा है पर, सावन में रहें आंखे बरसती, ये बात ठीक नहीं। हकीक़त में भी मिलो, बैठो, बातें करो ’संदीप’, यूं ख्वाबों में मटरगशती, ये बात ठीक नहीं। – संदीप सिंह –

आम नहीं बना करते

हर बार जी हजूरी से ही काम नहीं बना करते, काम बन भी जाए मगर मुकाम नहीं बना करते। ईमान के मालिक हो तो तुमसे खास कोई नहीं, किरदार बेच खास बनो, ऐसे आम नहीं बना करते।  कीमत प्यार हो तो मुफ्त में भी बिक जाओ मगर,  कागज़ के टुकड़े खरीद लें वो दाम नहीं बना करते। सोच में आफताब हो तो उजाला जरूर बिखरेगा, चमकती सुबह बन ऐ दोस्त, अंधेरी शाम नही बना करते। कुछ दर्द जरूरी होते हैं ज़माने से छिपाने को, हर दर्द छलक जाए वो जाम नहीं बना करते। एक कलंक चंदन के सौ टीकों पे भारी होता है, गुरूर बन किसी का, इल्जाम नही बना करते। चमकना है गर सूरज सा तो तपिश सहनी पड़ेगी, बुलंदी पर आसानी से कभी नाम नहीं बना करते। दिल साफ रखो तो सब खुद-ब-खुद साफ़ दिखेगा, आंखो पे चश्मा लगाने से बबूल आम नहीं बना करते। ताकत में कुछ कम न थे बाली और रावण भी ’संदीप’,  पर चरित्र की ताकत बिना कोई राम नहीं बना करते। –संदीप सिंह–

ख्वाब देखा है मैंने

सब्र रखने का दम गरीब में बेहिसाब देखा है मैंने, पैसे वाले की नीयत को होते खराब देखा है मैंने, माना औकात छोटी है, जितना हो सके काम आया हूं, औकात वालों के मुंह पे तो साफ जवाब देखा है मैंने। सिर्फ मंगल, वीर को छूने से पाप लगता है जिनको, बाकी पाँचो दिन उनके हाथों में शराब देखा है मैंने। बालों में सजा था किसी के जो ताज बन कर कभी, पत्ती पत्ती बिखरा वो सूखा गुलाब देखा है मैंने। बुजुर्गों से कसीदे सुनते आये जिस गुलसिताँ के बारे, टुकड़े टुकड़े होते वो देश पंजाब देखा है मैंने। जंग सिर्फ मैदान में नहीं कागज़ पर भी लड़ी जाती है,  कलम को तलवार, ढाल बनते किताब देखा है मैंने। तानाशाह सरकार घुटने टेकने को मजबूर हुई आखिर वजूद की खातिर किसानों का ऐसा इंकलाब देखा है मैंने। कुछ ऐसा लिख दे संदीप जो दिलों पे छाप छोड़ दे,    मुकम्मल हो खुदा जो ये ख्वाब देखा है मैंने। –संदीप सिंह–

इंसान! कमाल है तू

वाह रे इंसान, गज़ब कमाल करता है तू, गले में हार डाल कर हलाल करता है तू।                ताकतवर, बेईमान को तो हाथ जोड़ता फिरे,                शरीफ, कमज़ोर का हाल बेहाल करता है तू। जरूरी नहीं खंजर से ही कत्ल करे किसी का, जज्बातों के खून से भी हाथ लाल करता है तू।                खुशी बेहिसाब हो तो उसका शुक्र तक नहीं,                कुछ गम मिलें तो बड़ा बवाल करता है तू। जज़्बात दूसरों के लगें महज़ खिलौने बराबर, कोई तुझसे खेल जाए तो बड़ा मलाल करता है तू।                सौदे बाजी में ऐसा पक्का कि पहले मांगे खुदा से,                फिर बदले में चढ़ावे की रिश्वत की चाल चलता है तू। जो मूंह तोड़ जवाब दे, उससे परहेज रखता है, शराफत पर ही चालाकी का इस्तेमाल करता है तू।                खुद का गि...