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Showing posts from February, 2023

आजकल...

चौतरफा किताबें हैं पर, मैं खुद को पढ़ रहा हूँ आजकल, बाहर किसी से नहीं, अंदर खुद से लड़ रहा हूँ आजकल, बहार आएगी, शाख फिर हरी होगी, फूल फिर खिलेंगे, क्या हुआ गर पतझड़ के पेड़ सा झड़ रहा हूँ आजकल। बुनियाद मजबूत रखी है मेरे बाप ने सब्र और हिम्मत की  तूफानों के आगे हर बार पर्वत सा खड़ रहा हूँ आजकल। शिखर छूने की चाह है मगर ज़मीन को भी भूलता नहीं, रोज़ एक कदम उम्मीद की सीढ़ी चढ़ रहा हूँ आजकल। रफ्तार खरगोश सी किस काम की जो मुकाम भटका दे, कछुए सा सही, मैं मंजिल की ओर बढ़ रहा हूँ आजकल। मुसीबतें आती है, झिंझोड़ के गिराती हैं हर बार फिर भी, मुसीबत के आगे खुद मुसीबत बन खड़ रहा हूँ आजकल। बातों का असर नहीं लेता, कि बनाकर पत्थर खुद को हौंसले के हथौड़े से नए रूप में गढ़ रहा हूँ आजकल। - संदीप सिंह -

ख्वाब तकिए के नीचे

अक्सर तकिये के नीचे, कुछ ख़्वाब चुपके से आते हैं, कुछ बेचैन करते हैं रात भर, कुछ चैन से सुलाते हैं, कुछ तंज कसते हैं मेरी नाकामियों पर बार-बार, और कुछ कामयाबियों पर मेरी पीठ थप-थपाते हैं, अक्सर तकिये के नीचे कुछ ख़्वाब चुपके से आते हैं... कुछ ख्वाब शहर में बैठे, मुझे गांव से जोड़ देते हैं, मुझे गांव की गलियों, मेरे खेतों में छोड़ देते हैं, मैं ख़ुशी से घूमता-फिरता, टहलता हूँ रात भर,  आँख खुलते ही सुबह वापिस शहर को मोड़ देते हैं, यूं मेरे साथ आँख-मिचौली छुप छुपके खेल जाते है, अक्सर तकिये के नीचे कुछ ख़्वाब चुपके से आते हैं... कुछ ख्वाब कभी दिल अज़ीज़ को बाहों में भर देते हैं, कुछ पल ही सही, अधुरी ख्वाहिशों को पूरा कर देते हैं, हर पल हर लम्हा हकीकत लगने लगता है मगर   अधूरे रह कर मुझको भी अधूरा कर देते है खुशियों के सैलाब तो कभी बन आंसु के तुपके से आते है अक्सर तकिये के नीचे कुछ ख़्वाब चुपके से आते हैं.... सोचता हूं इन ख्वाबों ने जरूर खुदा को भी सताया होगा दुनिया सजाने का शायद खुदा को ख्वाब ही आया होगा चांद, तारे, सूरज और धरती सब कुछ इकठ्ठा करके   अपने ख्वाबों को रूप देकर ...

वक़्त, बड़ा कमबख्त

जो वक़्त है ये,  बड़ा ही सख़्त है ये, बादशाह है बादशाहों का,  किसी की सुनता नहीं, बड़ा कम्बख़्त है ये। जो वक़्त है ये,  बड़ा ही सख्त है ये... कभी सदियों सा लम्बा, कभी ये लम्हा सा लगता है, कभी महफिल बन आए, तो कभी तन्हा सा लगता है, पंख नहीं है मगर फिर भी उड़ता ही जा रहा है, उम्र बुजुर्गों सी कभी, तो कभी नन्हा सा लगता है, खट्टे मीठे पलों के फलों से लदा एक दरख़्त है ये, जो वक़्त है ये,  बड़ा ही सख्त है ये... अपनी मस्ती से चलता सबको पीछे छोड़ चुका है, बड़े आए तीस मार खां, सबका गुरूर तोड़ चुका है, जो तू लापरवाह हुआ तो ये भी बेपरवाह बहुत है, उस्ताद है जनाब, अच्छे अच्छों के कान मरोड़ चुका है, मगर जिसने जान ली, पहचान ली कीमत इसकी, सिर पे बिठाए उसको, बस उसका ही भक्त है ये, जो वक़्त है ये,  बड़ा ही सख्त है ये, बड़ा कमबख्त है ये... - संदीप सिंह -