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ਮੈਂ ਮਤਲਬੀ

ਦੇਖ ਕੇ ਦੁੱਖੜੇ ਹੋਰਾਂ ਦੇ ਜਦ ਜਾਣਕੇ ਅੱਖਾਂ ਮਿਚਾਂ ਮੈਂ ਫੇਰ ਮੇਰੇ ਹੋਕੇ ਵੀ ਨੀ ਸੁਣਨੇ ਭਾਵੇਂ ਮਾਰੀ ਜਾਵਾਂ ਚੀਕਾਂ ਮੈਂ ਜਿਹੜੀ ਨੱਕ ਨੂੰ ਉੱਚੀ ਰੱਖ ਕੇ ਸੱਜਣ ਸਾਰੇ ਦੂਰ ਕਰੇ ਮੁੜਨੇ ਨਈਂ ਭਾਵੇਂ ਓਸੇ ਨੱਕ ਨਾਲ ਕੱਢਾ ਸੌ ਸੌ ਲੀਕਾਂ ਮੈਂ ਕੋਈ ਨਹੀਂ ਜੋ ਦੁੱਖ ਵੰਡਾਵੇ ਕੱਲਾ ਬੈਠਾ ਸੋਗ ਕਰਾਂ ਵਕਤ ਕਚਹਰੀ ਪੇਸ਼ੀ ਲਗਦੀ ਭੁਗਤਾਂ ਰੋਜ਼ ਤਰੀਕਾਂ ਮੈਂ ਮੈਂ ਮੈਂ  ਛੱਡ  ਕੇ ,ਅਸੀਂ ਬੋਲਣਾ, ਸਭ ਦਾ ਸਾਥ ਜਰੂਰੀ ਹੈ ਕੱਲੇ ਨਾਲ ਨਾ ਦੁਨੀਆ ਬਣਦੀ ਸਿੱਖਿਆ ਇਹੋ ਸਲੀਕਾ ਮੈਂ ਜਿਸਤੋਂ ਕੰਮ ਨਹੀਂ ਉਸਤੋਂ ਦੂਰੋਂ ਦੇਖ ਕੇ ਹੀ ਮੂੰਹ ਫੇਰ ਲਿਆ  ਲੋੜ ਪੈਣ ਤੇ ਉਸਨੂੰ ਕਿਉਂ ਫੇਰ ਆਪਣੇ ਵੱਲ ਨੂੰ ਖਿੱਚਾਂ ਮੈਂ 
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ਸ਼ਬਦਾਂ ਦਾ ਘੇਰਾ

ਸ਼ਬਦਾਂ ਨੇ ਜਦ ਘੇਰ ਲਿਆ ਮੈਂ ਕਲਮ ਨੂੰ ਹੱਥ ਚ ਫੇਰ ਲਿਆ ਮੈਂ ਲਫ਼ਜ਼ਾਂ ਦਾ ਇਕ ਜਾਲ਼ ਬਣਾਕੇ  ਕਾਬੂ ਕਰ ਇਕ ਸ਼ੇਰ ਲਿਆ ਮੈਂ ਜ਼ੁਲਫਾਂ ਲਿਖੀਆਂ ਰਾਤ ਹਨੇਰੀ ਮੁਖੜਾ ਸੁਰਖ਼ ਸਵੇਰ ਕਿਹਾ ਮੈਂ ਕਦੇ ਹਾਸੇ ਲਿਖੇ ਚਾਨਣ ਵਰਗੇ ਕਦੇ ਰੋਣਾ ਨਿਰਾ ਹਨੇਰ ਕਿਹਾ ਮੈਂ ਜੋ ਸਭ ਲਿਖ ਗਏ ਮੈਂ ਵੀ ਲਿਖਿਆ ਬੱਸ ਲਫਜ਼ਾਂ ਦਾ ਕਰ ਹੇਰ ਫੇਰ ਲਿਆ ਮੈਂ ਅੱਖਰਾਂ ਦੇ ਨਾਲ ਕਲਮ ਦੀ ਕੁਸ਼ਤੀ ਕਰਨ ਦਾ ਕੰਮ ਦਿਲੇਰ ਲਿਆ ਮੈਂ

रुक, यूं मत जा

रुक, तू मत जा, रुक, यूं मत जा, पल भर को सोच ज़रा ये किस तरफ जा रहा है तू इस तरह खुद को खो कर आखिर क्या पा रहा है तू ज़िंदगी के सफर की अभी शुरुआत ही कहाँ हुई है  तेरे सपनों से अभी ढंग से तेरी बात भी कहाँ हुई है  हारा थोड़ी सी जमीं तो क्या पूरा आसमान बाकी है हौंसलो के पंख फड़फड़ा, अभी लंबी उड़ान बाकी है मंजिलें हर किसी की यहां कभी एक सी नहीं होंगी हिम्मत से चलता जायेगा तो कभी बेबसी नहीं होगी मुसीबतों के आगे तू झुक मत जा रुक, तू मत जा, रुक यूं मत जा याद रख, बाप का गुरुर, मां की आंख का तारा है तू पहला दोस्त भाई बहन का, सबको बड़ा प्यारा है तू सोच कि तेरे लिए मुश्किलों में वो कब खड़े नहीं हुए गलतफहमी छोड़, उनके ख्वाब कभी तुझसे बड़े नहीं हुए हाँ उनकी ख्वाहिशों का अपने सपनो पे ना दबाव रख  जो चाहता है वो कर, दिल खोल के सामने जवाब रख  ना खुद को ख़त्म कर, ना अपने जूनून को मरने दे  ज़मीं पर बेफिज़ूल न बहा, हौसलों में खून उतरने दे  बहारें तो आनी है, अभी से तू सूख मत जा रुक, तू मत जा, रुक, यूं मत जा ये दुनिया है, यहां सब के तरक्की के पैमाने अलग है हर किसी की नजर में बुलंदी क...

तेरा शहर, मेरा गाँव

तेरे शहर को तरक्की का गुरूर बड़ा है, देख मेरे गाँव पे सुकून का सुरूर चढ़ा है, पेट भरे दुनिया का फिर भी सादगी दिलों में, वहाँ सब मिलावटी फिर भी मगरुर बड़ा है। देखने को भीड़ बहुत है तेरे शहर में लेकिन, अंदर से हर शख्स दूजे से बड़ी दूर खड़ा है। हर कोई हर किसी को अँधेरे में रखता है वहां, कहने को चकाचौंध के लिए मशहूर बड़ा है। माना किताबें ज्यादा नहीं पढ़ी किसी ने यहाँ पर, बुजुर्गों के फलसफों से जिंदगी को जरूर पढ़ा है। ये वृद्धाश्रम का चलन भी तेरे शहर से चला है, यहां तो हर बुजुर्ग परिवार में कोहिनूर जड़ा है। जरूरत पड़ने पर पूरा गाँव साथ हो जाता है यहाँ, वहाँ ज़रूरत पे फायदा उठाने का दस्तूर बड़ा है। मसला यहां बैठ सुलझाते हैं बड़े मसले पँचायत में, वहाँ सालों बाद अदालत कहे कि बेकसूर लड़ा है। फिर सोचता हूँ अपनी जगह सब ठीक है ‘संदीप‘, – संदीप सिंह –

तेरे रहनुमाँ बहुत हैं

माना कि  शहर में तेरे रहनुमाँ बहुत   हैं,  फिक्रमंद कम हैं और  खामखां बहुत  हैं पहरेदारी की फ़िक्र ना कर , ये  सब पे नजर रखते  हैं तुझे खुद खबर नहीं ये तेरी कितनी खबर रखते  हैं खुद के गम से नहीं ये तेरी हसीं से  परेशाँ  बहुत  हैं माना कि  शहर   में   तेरे   रहनुमाँ   बहुत   हैं                       नसीहत ना चाह कर लोगे, मुफ्त के कर्ज़दार बनोगे,                     मिला लो हाँ में हाँ इनकी, तो तुम समझदार बनोगे,                     सुनोगे  दिल की  तो कहेंगे,  अरे  तू नादाँ बहुत  हैं,                      माना कि  शहर   में   तेरे   रहनुमाँ ...

यह कैसा दौर है...

क्या दौर है जनाब, क्या क्या सामान बिक रहा है, ज़मीर बिक रहा है, ईमान बिक रहा है। सब कुछ यहाँ बिकाऊ , कीमत सही लगाओ,  चंद सिक्कों की खातिर इन्सान बिक रहा है।। मर कर दो गज़ के मालिक बने थे जो बमुश्किल, वो मुर्दे हैराँ हैं कि उनका शमशान बिक रहा है। हर रोज़ धर्म की नई, एक दुकान खुल रही है,  लेलो कि सस्ते दाम में भगवान बिक रहा है।। उस मुल्क की हिफाज़त खुदा भी न कर सकेगा,  जिस मुल्क की सरहद का निगेहबान बिक रहा है।  जिस मेज़ पर तिरंगा, उसी मेज़ के नीचे से,  अपनों के हाथों मेरा भारत महान बिक रहा है।।  अरबों का कर्जा खाकर, साहेब बैठे विदेश जाकर, यहां चंद हजार कर्जे में रोज़ किसान बिक रहा है। धूप, ठंड, बारिश, झेल कर उगाये फिर भी, रो-रो के उसका गेहूँ, मक्का, धान बिक रहा है।।   - संदीप सिंह -

एक चक्कर अस्पताल का

गम ज्यादा सताए तो खुदा के दर तो जरूर जाया करो, पर हो सके तो एक चक्कर अस्पताल लगा आया करो,                किसी कमरे में नई जिंदगी तुम्हे जन्म लेती दिखेगी,                 किसी बुजुर्ग की आखिरी सांसे जवाब देती दिखेगी,  कहीं कोई बेटा बीमार मां का ख्याल रख रहा होगा, हमारे साथ ही क्यों? हर कोई सवाल कर रहा होगा,                कोई बाप बेसुध बेटे को बाहों में उठाए खड़ा होगा,                कोई इलाज की खातिर बेदर्द गरीबी से लड़ा होगा, कोई आग में झुलसा, कोई सड़क हादसे का शिकार, किसी को दिल का दौरा, कोई दर्द ए दिल का बीमार,                थका कैंसर से लड़ कर आखिरी घड़ियां गिन रहा कोई,                ना रात रात लगे उसको, ना उसका अब दिन रहा कोई, खुदकुशी कर जिंदगी और मौत के बीच फंसा हुआ, हर कोई मिलेगा दवाइयों के दलदल में धंस...

ये बात ठीक नहीं

पहचान बनाओ तो खुद की मेहनत से, खैरात से बने हस्ती, ये बात ठीक नहीं। छोटे घर को महज़ बड़ा मकान बनाने को, उजाड़ दो कोई बस्ती, ये बात ठीक नहीं। बात जब भी करो तो दिल से किया करो, रिश्तों में ज़बरदस्ती, ये बात ठीक नहीं। समंदर डुबा दे, गम नहीं, ये हक है उसका, साहिल पे डूबे कश्ती, ये बात ठीक नहीं। दिल बहलाने को ज़माने में चीजें बहुत हैं लेकिन, किसी मजबूर से करो मस्ती, ये बात ठीक नहीं। शौंक बड़े ठीक हैं, पर दिल भी तो बड़ा रखो, बातें महंगी, नीयत सस्ती, ये बात ठीक नहीं। माना कि मोहब्बत में दूरियों का भी मजा है पर, सावन में रहें आंखे बरसती, ये बात ठीक नहीं। हकीक़त में भी मिलो, बैठो, बातें करो ’संदीप’, यूं ख्वाबों में मटरगशती, ये बात ठीक नहीं। – संदीप सिंह –

आम नहीं बना करते

हर बार जी हजूरी से ही काम नहीं बना करते, काम बन भी जाए मगर मुकाम नहीं बना करते। ईमान के मालिक हो तो तुमसे खास कोई नहीं, किरदार बेच खास बनो, ऐसे आम नहीं बना करते।  कीमत प्यार हो तो मुफ्त में भी बिक जाओ मगर,  कागज़ के टुकड़े खरीद लें वो दाम नहीं बना करते। सोच में आफताब हो तो उजाला जरूर बिखरेगा, चमकती सुबह बन ऐ दोस्त, अंधेरी शाम नही बना करते। कुछ दर्द जरूरी होते हैं ज़माने से छिपाने को, हर दर्द छलक जाए वो जाम नहीं बना करते। एक कलंक चंदन के सौ टीकों पे भारी होता है, गुरूर बन किसी का, इल्जाम नही बना करते। चमकना है गर सूरज सा तो तपिश सहनी पड़ेगी, बुलंदी पर आसानी से कभी नाम नहीं बना करते। दिल साफ रखो तो सब खुद-ब-खुद साफ़ दिखेगा, आंखो पे चश्मा लगाने से बबूल आम नहीं बना करते। ताकत में कुछ कम न थे बाली और रावण भी ’संदीप’,  पर चरित्र की ताकत बिना कोई राम नहीं बना करते। –संदीप सिंह–

ख्वाब देखा है मैंने

सब्र रखने का दम गरीब में बेहिसाब देखा है मैंने, पैसे वाले की नीयत को होते खराब देखा है मैंने, माना औकात छोटी है, जितना हो सके काम आया हूं, औकात वालों के मुंह पे तो साफ जवाब देखा है मैंने। सिर्फ मंगल, वीर को छूने से पाप लगता है जिनको, बाकी पाँचो दिन उनके हाथों में शराब देखा है मैंने। बालों में सजा था किसी के जो ताज बन कर कभी, पत्ती पत्ती बिखरा वो सूखा गुलाब देखा है मैंने। बुजुर्गों से कसीदे सुनते आये जिस गुलसिताँ के बारे, टुकड़े टुकड़े होते वो देश पंजाब देखा है मैंने। जंग सिर्फ मैदान में नहीं कागज़ पर भी लड़ी जाती है,  कलम को तलवार, ढाल बनते किताब देखा है मैंने। तानाशाह सरकार घुटने टेकने को मजबूर हुई आखिर वजूद की खातिर किसानों का ऐसा इंकलाब देखा है मैंने। कुछ ऐसा लिख दे संदीप जो दिलों पे छाप छोड़ दे,    मुकम्मल हो खुदा जो ये ख्वाब देखा है मैंने। –संदीप सिंह–

इंसान! कमाल है तू

वाह रे इंसान, गज़ब कमाल करता है तू, गले में हार डाल कर हलाल करता है तू।                ताकतवर, बेईमान को तो हाथ जोड़ता फिरे,                शरीफ, कमज़ोर का हाल बेहाल करता है तू। जरूरी नहीं खंजर से ही कत्ल करे किसी का, जज्बातों के खून से भी हाथ लाल करता है तू।                खुशी बेहिसाब हो तो उसका शुक्र तक नहीं,                कुछ गम मिलें तो बड़ा बवाल करता है तू। जज़्बात दूसरों के लगें महज़ खिलौने बराबर, कोई तुझसे खेल जाए तो बड़ा मलाल करता है तू।                सौदे बाजी में ऐसा पक्का कि पहले मांगे खुदा से,                फिर बदले में चढ़ावे की रिश्वत की चाल चलता है तू। जो मूंह तोड़ जवाब दे, उससे परहेज रखता है, शराफत पर ही चालाकी का इस्तेमाल करता है तू।                खुद का गि...

मेरी पहली पतंग

बचपन में एक रोज़ जब मैं घर की छत पे चढ़ बैठा, कागज़ की उड़ती चिड़िया देख विचार दिल में गड़ बैठा, कि कैसे डोर से बंधा एक कागज़ हवा में उड़े जा रहा है, धरती पे बैठे जैसे आसमान से कोई तार जुड़े जा रहा है, भागा गया बड़े भाई के पास, मेरी भी पतंग बना दो ना वो बोला बाद में, मैने जिद्द की, आज ही सिखा दो ना फिर अलमारी से अखबार और झाड़ू से सींखे निकाली, कीकर के पेड़ से गोंद लेकर, अखबार पे सीँखे चिपकाली, मां की सिलाई मशीन से रील लेकर डोरी लगाई हमने, बड़े लाड़ से वो बचपन की पहली पतंग बनाई हमने, भाई ने पकड़ी डोरी तो कन्नी देकर हवा में उछाला मैने, इक बार तो छत से गिरते गिरते खुद को संभाला मैने। हाथों से छूटते ही मानो हवा ने गोद में उठा लिया उसे, झूला सा झूलाती, लहराती, आसमान में उड़ा दिया उसे, डोर जब मैने पकड़ी तब खुशी से न समा रहा था मैं, पायलट जैसा एहसास था, कोई जहाज उड़ा रहा था मैं, पर ज्यादा देर न हुई कि मेरी खुशियों को लगा एक झटका, गली का शातिर पतंगबाज भी अपनी छत पे आ धमका। बड़ी तेजी से अपनी पतंग आसमान में चढ़ा दी उसने, मेरी काटने के इरादे से पतंग इस ओर बढ़ा दी उसने, ये सब देख मैं भ...

ज़िम्मेदार बचपन

हाथ छोटे मगर ज़िम्मेदारियां बड़ी निभा रहा है वो छोटू नहीं, घर का बड़ा है, सबका बोझ उठा रहा है वो पेन पेंसिल, गुब्बारे, खिलौने, जो बचपन सजाते है  ये बेशकीमती शौक बेबस होकर बेचे जा रहा है वो सोचने का वक्त नहीं कि किस्मत चमकेगी या नहीं  अभी दो वक्त रोटी को जूठी थाली चमका रहा है वो भूख के पास गिरवी रख आया वो बचपन अपना खुद का आज बेच, छोटे का कल बचा रहा है वो मां से प्यार, बाप से बेफिक्री, नसीब न हो सकी उसे  छोटे भाई-बहनों को मां बाप बनके दिखा रहा है वो स्कूल भेजे उन्हें ताकि ज़िंदगी जीना सीख जाए  खुद जिंदगी से सीखने काम पर जा रहा है वो छोटी उम्र में ही चुन लिया खुद्दारी का रास्ता  हट्टे कट्टे नाकारों को आइना दिखा रहा है वो - संदीप सिंह-

आजकल...

चौतरफा किताबें हैं पर, मैं खुद को पढ़ रहा हूँ आजकल, बाहर किसी से नहीं, अंदर खुद से लड़ रहा हूँ आजकल, बहार आएगी, शाख फिर हरी होगी, फूल फिर खिलेंगे, क्या हुआ गर पतझड़ के पेड़ सा झड़ रहा हूँ आजकल। बुनियाद मजबूत रखी है मेरे बाप ने सब्र और हिम्मत की  तूफानों के आगे हर बार पर्वत सा खड़ रहा हूँ आजकल। शिखर छूने की चाह है मगर ज़मीन को भी भूलता नहीं, रोज़ एक कदम उम्मीद की सीढ़ी चढ़ रहा हूँ आजकल। रफ्तार खरगोश सी किस काम की जो मुकाम भटका दे, कछुए सा सही, मैं मंजिल की ओर बढ़ रहा हूँ आजकल। मुसीबतें आती है, झिंझोड़ के गिराती हैं हर बार फिर भी, मुसीबत के आगे खुद मुसीबत बन खड़ रहा हूँ आजकल। बातों का असर नहीं लेता, कि बनाकर पत्थर खुद को हौंसले के हथौड़े से नए रूप में गढ़ रहा हूँ आजकल। - संदीप सिंह -

ख्वाब तकिए के नीचे

अक्सर तकिये के नीचे, कुछ ख़्वाब चुपके से आते हैं, कुछ बेचैन करते हैं रात भर, कुछ चैन से सुलाते हैं, कुछ तंज कसते हैं मेरी नाकामियों पर बार-बार, और कुछ कामयाबियों पर मेरी पीठ थप-थपाते हैं, अक्सर तकिये के नीचे कुछ ख़्वाब चुपके से आते हैं... कुछ ख्वाब शहर में बैठे, मुझे गांव से जोड़ देते हैं, मुझे गांव की गलियों, मेरे खेतों में छोड़ देते हैं, मैं ख़ुशी से घूमता-फिरता, टहलता हूँ रात भर,  आँख खुलते ही सुबह वापिस शहर को मोड़ देते हैं, यूं मेरे साथ आँख-मिचौली छुप छुपके खेल जाते है, अक्सर तकिये के नीचे कुछ ख़्वाब चुपके से आते हैं... कुछ ख्वाब कभी दिल अज़ीज़ को बाहों में भर देते हैं, कुछ पल ही सही, अधुरी ख्वाहिशों को पूरा कर देते हैं, हर पल हर लम्हा हकीकत लगने लगता है मगर   अधूरे रह कर मुझको भी अधूरा कर देते है खुशियों के सैलाब तो कभी बन आंसु के तुपके से आते है अक्सर तकिये के नीचे कुछ ख़्वाब चुपके से आते हैं.... सोचता हूं इन ख्वाबों ने जरूर खुदा को भी सताया होगा दुनिया सजाने का शायद खुदा को ख्वाब ही आया होगा चांद, तारे, सूरज और धरती सब कुछ इकठ्ठा करके   अपने ख्वाबों को रूप देकर ...

वक़्त, बड़ा कमबख्त

जो वक़्त है ये,  बड़ा ही सख़्त है ये, बादशाह है बादशाहों का,  किसी की सुनता नहीं, बड़ा कम्बख़्त है ये। जो वक़्त है ये,  बड़ा ही सख्त है ये... कभी सदियों सा लम्बा, कभी ये लम्हा सा लगता है, कभी महफिल बन आए, तो कभी तन्हा सा लगता है, पंख नहीं है मगर फिर भी उड़ता ही जा रहा है, उम्र बुजुर्गों सी कभी, तो कभी नन्हा सा लगता है, खट्टे मीठे पलों के फलों से लदा एक दरख़्त है ये, जो वक़्त है ये,  बड़ा ही सख्त है ये... अपनी मस्ती से चलता सबको पीछे छोड़ चुका है, बड़े आए तीस मार खां, सबका गुरूर तोड़ चुका है, जो तू लापरवाह हुआ तो ये भी बेपरवाह बहुत है, उस्ताद है जनाब, अच्छे अच्छों के कान मरोड़ चुका है, मगर जिसने जान ली, पहचान ली कीमत इसकी, सिर पे बिठाए उसको, बस उसका ही भक्त है ये, जो वक़्त है ये,  बड़ा ही सख्त है ये, बड़ा कमबख्त है ये... - संदीप सिंह -

मेरे ख्यालात

कुछ बातों में आज भी पुराने ख्यालात रखता हूँ मैं, कि जो दिल में है, जुबां पे भी वही बात रखता हूँ मैं। फालतू की बातों से परहेज़ है बस और कुछ नहीं, लोग सोचते हैं गुरूर है, जो कम बात करता हूँ मैं। कौनसी बात, किसे बुरी लग जाए, क्या पता, इसलिए बोलते वक्त थोड़ी एहतियात रखता हूँ मैं। कोई जादूगर नहीं, सादा किसान का बेटा हूँ मगर, चंद दानों से लाखों उगाने की करामात रखता हूँ मैं। बड़ी गाड़ी बड़ा मकान बड़े ख्वाब हैं लेकिन, पुराने मकान की तस्वीर बटुए में साथ रखता हूँ मैं। लड़ने का शौक नहीं मगर कायर भी ना समझना मुझे, जिंदगी से हर रोज़ से दो दो हाथ करता हूँ मैं। महबूब सा बन कर मेरी, जवाब देती रहा कर बस, ऐ जिंदगी! जब कभी भी तुझसे सवालात करता हूँ मैं। - संदीप सिंह -

आदाब से हिसाब तक..

नज़र-ए-करम हम पर कुछ ऐसी जनाब कर गए पास से गुज़रे और झुकी आँखों से आदाब कर गए, चेहरा उनका लगा गा़लिब की कोई गज़ल सा मुझे, सामने आए तो लब खुद-ब-खुद इरशाद कर गए।  ये नदी यूँ ही नहीं मदहोश सी बल खाए जा रही है, होठों से छुआ है, वो उसके पानी को शराब कर गए।  मैं चला था ओर उनकी, हौंसला तूफानों सा लेकर, आँखों में डुबोकर, मुझ समंदर को तालाब कर गए।  ख्वाबों में ही सही, मगर हाथ में हाथ था उनका, जो मैं न कर सका, वो काम मेरे ख़्वाब कर गए। उनके चेहरे के आगे चाँद भी फीका सा पड़ रहा है, बाकमाल नूर है वो हर तारे को आफ़ताब कर गए।  शिकायत थी कि इंतज़ार बहुत करवाया उसने 'संदीप' पर एक मुलाक़ात में वो सालों का हिसाब कर गए। - संदीप सिंह -

बात कल रात की

कल रात की ही बात है, मैं जा कर बिस्तर पर लेटा था, वहीं साथ ही नटखट सा मेरा 5 साल का बेटा था। लेटे-लेटे जब बाजू को मैंने एक तरफ कर रख दिया, वो आकर पास लेटा और मेरी बाजू पर सर रख दिया। भोली-भाली सी बातें करता, मेरे साथ खेलता रहा, कभी कान-नाक, कभी दाढ़ी-मूछों को छेड़ता रहा। मस्ती करता जाने कब वो अपने ख्वाबों में खो गया, मेरे सीने पे हाथ, पेट पे टांग रख लिपट कर सो गया। तभी हू-ब-हू ऐसी ही ज़हन में एक पुरानी बात आ गई, इस बाप को भी कल रात अपने बाप की याद आ गई। यादों का सिलसिला चल पडा़ पुरानी कड़ियाँ खुलने लगी, बेटे की हर बात जैसे मुझसे और मेरे पापा से जुड़ने लगी। याद आया कि पापा के साथ मेरा ऐसे ही सोना होता था, बाजू पर सर होता था वही मेरा तकिया-बिछौना होता था। अब जब भी इसे बाइक पर अपने आगे बिठाता हूँ , तो खुद को पापा की साइकिल पर आगे बैठा पाता हूँ। किसी शाम हाथ थामे जब जाता हूँ शहर के हरे मैदानों में, महसूस होता है पापा के साथ हूँ गाँव के खेत-खलिहानों में। एक तसवीर भी दिखी हम तीनों की, मानो चार चाँद ...

बिन तेरे और तेरे साथ...

बिना तेरे किसी बेज़ान पत्थर सा पड़ा होता हूँ, और तुम साथ हो तो जैसे हीरे में जड़ा होता हूँ। मज़ा आता है लोगों के कलेजे जलते देखकर,  मैं जब भी महफ़िल में तुम्हारे साथ खड़ा होता हूँ।  तेरा रूठना कम्बख़त मौसम-ए-बहार भी पतझड़, और मैं पेड़ से किसी सूखे पत्ते सा झड़ा होता हूँ। एक तुम, जिसे हर बार जल्दी जाने की होती है, एक मैं, ''अभी न जाओ'' इसी ज़िद पे अड़ा होता हूँ। वो रात जब इन आँखों को दीदार नहीं होता तेरा, मैं पागल हर दफा मेरे ख्वाबों से लड़ा होता हूँ। बचाकर गर्म हवाओं से उसे रखता हूँ कुछ ऐसे, कि जो वो पानी हो तो मैं मिट्टी का घडा़ होता हूँ। -संदीप सिंह-

नशे दा कहर - Tragic Story of Many Families (Hindi/Punjabi)

बड़ा हो गया कुवेला (देर रात), हले घर नइयों आया, माड़े ओंदे ने ख्याल, जांदा दिल घबराया, बैठा सारा परिवार, ओहदी उड़ीक करी जावे, कित्थे-किवें होणा, पल-पल सोच मरी जावे।          बूहा (दरवाजा) पिट्टया किसे ने, बाहरों आवाज इक छड्डी,           ''ओ कोई खोलो दरवाजा'' कह के गाल (गाली) इक कड्डी,          कुंडा खोलया जो माँ ने, सामणे बुत्त जेहा खड़ा,           लै के बूहे दा सहारा, ओहदा पुत्त सीगा खड़ा।   नशे दा सी भार, खड़ा होया नी सी जा रिहा,  ओहनू वेख सबना दा, रोणा सीगा आ रिहा,  अक्खां खुली-बंद जेही, पैर धरती सी लब्ब (ढूंढ) रहे,   कदे उट्ठे  कदे   डिग्गे, बेबे-बापू ओहनू चक रहे।             औखा-सौखा होके, ठाके मंजे उत्ते पाया सी,           एह की कित्ता कहके, बापू छाती नाल लाया सी,          की कमी रही दस्स ,  ...

दुआ

ऐ ख़ुदा तेरी  रहमतों का कुछ ऐसा अंदाज़ रहे  मेरे दिल में हो फ़कीरी, बेशक़ सर पे ताज़ रहे  मुश्किलों से लड़ूं तुम बाज़ुओ को शेर कर दो  नज़र मंज़िल से न हटे इन आँखों में बाज़ रहे आने वाला कल भी, परसों बीता कल हो जायेगा  जी लूँ  जी भर ज़िंदगी जब तलक ये आज रहे कटे जुबाँ जो मेरे बोल दुखाएँ दिल किसी का मगर हक में सदा सबसे ऊँची मेरी आवाज़ रहे दुनिया लाख हो रुसवा मुझे परवाह नहीं कोई बस मेरे माँ-बाप ना कभी मुझसे नाराज़ रहे मिट्टी में दबूँ किसी के एहसान में दबने से पहले किसी बंदे का नहीं 'संदीप' सिर्फ तेरा मोहताज़ रहे  - संदीप सिंह -

बचपन का इतवार

सुकून वो पहले जैसा अब कहीं भी मेरे यार नहीं है  Sunday तो है पर मेरे बचपन का वो इतवार नहीं है एक गीत सुनने को आज Channel हजार हैं लेकिन  कमी सी खलती है कि वो "रंगोली", "चित्रहार" नहीं है  Sunday तो है पर मेरे बचपन का वो इतवार नहीं है... गलियां सूनी पड़ जाती, 9 बजते वक्त सा थम जाता चंद्रकांता देखने हर कोई टीवी के आगे जम जाता एक तरफ था बलू, बघीरा, उधर ताबाकी शेर खान  चड्डी पहन के फूल खिला था वो मोगली सबकी जान Tom & Jerry, Duck Tales, Micky Mouse  बड़ा ही प्यार था इन सबने मिलकर तब मेरा बचपन खूब संवारा था अलिफ लैला की कहानियों में हम सब कहीं खो जाते बेताल भूत को पकड़े विक्रम देख खड़े रोंगटे हो जाते  पहले जैसे इतने प्यारे अब यादगार किरदार नहीं है Sunday तो है पर मेरे बचपन का वो इतवार नहीं है   एक ख़बर को चीख चीख, ना पूरा दिन घुमाते थे 15 मिनट नजा़कत से तब ''समाचार'' सुनाते थे टी.वी जिसके घर होता वहाँ दौडे़ भागे जाते थे दूरदर्शन पर चक्रधारी जब ''श्री कृष्ण'' आते थे  ''रामायण'' और ''महाभारत'' जैसे अब संस्क...

कलम से गुफ्तगू

एक रोज़ मैं कलम से गुफ्तगू कर बैठा, दबे दिल के जज़्बात उसके रूबरू कर बैठा।                             मेरा हाल-ए-दिल उसने फिर लफ़्ज़ों को सुना दिया,                     करके कानाफूसी उनसे एक अफसाना बना दिया। और फिर आवाज़ देकर के कागज को भी पुकारा गया, जज़्बातों से भरे मेरे लफ़्ज़ों को उस पर उतारा गया।                      इतना कुछ हुआ जो लिखने की ज़ुस्तज़ु कर बैठा,                     एक रोज़ मैं कलम से गुफ्तगू कर बैठा... अब सोचता हूँ दबे रह जाते ये एहसासों के मोती,  बयाँ होता ना बहुत कुछ अगर ये पास ना होती।                    बात बढ़ती गई और अब तो जैसे यारी सी हो गई,            ...

10 दात्तां - Ten Blessings (Punjabi)

Hindi Version: देणा दे सकदा नहीं रब्बा, तेरी दित्ती होइयाँ दात्तां दा, मेरी सोच तों वड्डी दात तेरी, बड़ा छोटा मैं औकातां दा,  मेरी कलम चों लफ्ज़  वी मुक्क चल्ले, लग्गा  जिक्र करण सौगातां दा, अज्ज कोशिश है एह छोटी जई, दिल भरया मेरा जज़्बातां दा।  मेरा बापू पहली दात तेरी, जिहने तेरे वांग ही प्यार दित्ता, हड्ड साड़, लहू निचोड़ अपणा, मेरे सुपनयां नूं आकार दित्ता,  दुज्जी दात है मेरी माँ अमड़ी, जिहने धर्म कर्म संस्कार दित्ता,  मैंनू हसदा वसदा वेखन लई, अपणी सब खुशियां नूं वार दित्ता।  तिज्जी दात च  मिलया वीर वड्डा, जो नाल मेरे जिवें सज्जी बांह, इक पैण (बहन) है चौथी दात तेरी, मेरे लई जिवें ओह दुज्जी माँ, मेरे यार प्यारे दात पंजवी, तप्दी धरती लई ज्यों संगणी छां, मुँह रोज़ी ला, कम्म कार दित्ता, एह छेवीं दात जिथे किरत करां। किवें सत्त्वीं दात दा मुल्ल देवां, दुःख-सुख दा हाणी मिलाया तूँ, अट्ठवीं ते नौवीं दात दे विच, ती (बेटी) ते पुत्तर झोली पाया तूँ , दसवीं दात है तेरा नाम सच्चा, एह सच मैनु समझाया तूँ , एन्ना कुज बक्श निमाणे नूं, 10 दात्तां दा मालक बणाया तूँ। ...