Skip to main content

इंसान! कमाल है तू


वाह रे इंसान, गज़ब कमाल करता है तू,
गले में हार डाल कर हलाल करता है तू।

            ताकतवर, बेईमान को तो हाथ जोड़ता फिरे,
            शरीफ, कमज़ोर का हाल बेहाल करता है तू।

जरूरी नहीं खंजर से ही कत्ल करे किसी का,
जज्बातों के खून से भी हाथ लाल करता है तू।

            खुशी बेहिसाब हो तो उसका शुक्र तक नहीं,
            कुछ गम मिलें तो बड़ा बवाल करता है तू।

जज़्बात दूसरों के लगें महज़ खिलौने बराबर,
कोई तुझसे खेल जाए तो बड़ा मलाल करता है तू।

            सौदे बाजी में ऐसा पक्का कि पहले मांगे खुदा से,
            फिर बदले में चढ़ावे की रिश्वत की चाल चलता है तू।

जो मूंह तोड़ जवाब दे, उससे परहेज रखता है,
शराफत पर ही चालाकी का इस्तेमाल करता है तू।

            खुद का गिरेहबान भी झाँक ले इक बार 'संदीप',
            उंगली खुद पे भी उठेगी जैसे सवाल करता है तू।



–संदीप सिंह–

Comments

  1. Very nice 👏👏

    ReplyDelete
  2. Wah kamal really lovely. All the best

    ReplyDelete
  3. Waah kyaa baat hai maza aa gaya 👌👌😊 ye hui na baat 👍👍💯💯

    ReplyDelete
  4. कमाल कित्ता 👍👏👏👏

    ReplyDelete
  5. Nice bro...👍👍

    ReplyDelete
  6. Very nice.kamal ......

    ReplyDelete
  7. निश्शब्द हूँ, प्रशंसा के लिए शब्द कम हैं।।।। God bless you & your poem.... चरैवेति चरैवेति ।। 🙏

    ReplyDelete
  8. सबका बहुत बहुत धन्यवाद

    ReplyDelete
  9. Excellent, brilliant, great.!!! Well done. Exposed the reality most of mankind have.

    ReplyDelete

Post a Comment

Thank you for support... Keep sharing🙏🙏

Popular posts from this blog

ख्वाब देखा है मैंने

सब्र रखने का दम गरीब में बेहिसाब देखा है मैंने, पैसे वाले की नीयत को होते खराब देखा है मैंने, माना औकात छोटी है, जितना हो सके काम आया हूं, औकात वालों के मुंह पे तो साफ जवाब देखा है मैंने। सिर्फ मंगल, वीर को छूने से पाप लगता है जिनको, बाकी पाँचो दिन उनके हाथों में शराब देखा है मैंने। बालों में सजा था किसी के जो ताज बन कर कभी, पत्ती पत्ती बिखरा वो सूखा गुलाब देखा है मैंने। बुजुर्गों से कसीदे सुनते आये जिस गुलसिताँ के बारे, टुकड़े टुकड़े होते वो देश पंजाब देखा है मैंने। जंग सिर्फ मैदान में नहीं कागज़ पर भी लड़ी जाती है,  कलम को तलवार, ढाल बनते किताब देखा है मैंने। तानाशाह सरकार घुटने टेकने को मजबूर हुई आखिर वजूद की खातिर किसानों का ऐसा इंकलाब देखा है मैंने। कुछ ऐसा लिख दे संदीप जो दिलों पे छाप छोड़ दे,    मुकम्मल हो खुदा जो ये ख्वाब देखा है मैंने। –संदीप सिंह–

एक चक्कर अस्पताल का

गम ज्यादा सताए तो खुदा के दर तो जरूर जाया करो, पर हो सके तो एक चक्कर अस्पताल लगा आया करो,                किसी कमरे में नई जिंदगी तुम्हे जन्म लेती दिखेगी,                 किसी बुजुर्ग की आखिरी सांसे जवाब देती दिखेगी,  कहीं कोई बेटा बीमार मां का ख्याल रख रहा होगा, हमारे साथ ही क्यों? हर कोई सवाल कर रहा होगा,                कोई बाप बेसुध बेटे को बाहों में उठाए खड़ा होगा,                कोई इलाज की खातिर बेदर्द गरीबी से लड़ा होगा, कोई आग में झुलसा, कोई सड़क हादसे का शिकार, किसी को दिल का दौरा, कोई दर्द ए दिल का बीमार,                थका कैंसर से लड़ कर आखिरी घड़ियां गिन रहा कोई,                ना रात रात लगे उसको, ना उसका अब दिन रहा कोई, खुदकुशी कर जिंदगी और मौत के बीच फंसा हुआ, हर कोई मिलेगा दवाइयों के दलदल में धंस...

मेरी पहली पतंग

बचपन में एक रोज़ जब मैं घर की छत पे चढ़ बैठा, कागज़ की उड़ती चिड़िया देख विचार दिल में गड़ बैठा, कि कैसे डोर से बंधा एक कागज़ हवा में उड़े जा रहा है, धरती पे बैठे जैसे आसमान से कोई तार जुड़े जा रहा है, भागा गया बड़े भाई के पास, मेरी भी पतंग बना दो ना वो बोला बाद में, मैने जिद्द की, आज ही सिखा दो ना फिर अलमारी से अखबार और झाड़ू से सींखे निकाली, कीकर के पेड़ से गोंद लेकर, अखबार पे सीँखे चिपकाली, मां की सिलाई मशीन से रील लेकर डोरी लगाई हमने, बड़े लाड़ से वो बचपन की पहली पतंग बनाई हमने, भाई ने पकड़ी डोरी तो कन्नी देकर हवा में उछाला मैने, इक बार तो छत से गिरते गिरते खुद को संभाला मैने। हाथों से छूटते ही मानो हवा ने गोद में उठा लिया उसे, झूला सा झूलाती, लहराती, आसमान में उड़ा दिया उसे, डोर जब मैने पकड़ी तब खुशी से न समा रहा था मैं, पायलट जैसा एहसास था, कोई जहाज उड़ा रहा था मैं, पर ज्यादा देर न हुई कि मेरी खुशियों को लगा एक झटका, गली का शातिर पतंगबाज भी अपनी छत पे आ धमका। बड़ी तेजी से अपनी पतंग आसमान में चढ़ा दी उसने, मेरी काटने के इरादे से पतंग इस ओर बढ़ा दी उसने, ये सब देख मैं भ...