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कलम से गुफ्तगू



एक रोज़ मैं कलम से गुफ्तगू कर बैठा,
दबे दिल के जज़्बात उसके रूबरू कर बैठा।
        
               मेरा हाल-ए-दिल उसने फिर लफ़्ज़ों को सुना दिया,
                करके कानाफूसी उनसे एक अफसाना बना दिया।

और फिर आवाज़ देकर के कागज को भी पुकारा गया,
जज़्बातों से भरे मेरे लफ़्ज़ों को उस पर उतारा गया। 

                इतना कुछ हुआ जो लिखने की ज़ुस्तज़ु कर बैठा,
                एक रोज़ मैं कलम से गुफ्तगू कर बैठा...

अब सोचता हूँ दबे रह जाते ये एहसासों के मोती, 
बयाँ होता ना बहुत कुछ अगर ये पास ना होती। 

               बात बढ़ती गई और अब तो जैसे यारी सी हो गई, 
                मेरी ज़ुबाँ ही बन गई ये इस कदर प्यारी हो गई। 

और अब मैं लिखता नहीं कलम चलाया करता हूं, 
चढ़ाकर तीर लफ्जों के निशाने लगाया करता हूं।
        
                बातें एक शायर की तरह हू-ब-हू कर बैठा, 
                एक रोज़ मैं कलम से गुफ्तगू कर बैठा,
                दबे दिल के जज़्बात उसके रूबरू कर बैठा,
                एक रोज़ मैं कलम से गुफ्तगू कर बैठा...

- संदीप सिंह -

Comments

  1. V Good. Keep it up.

    ReplyDelete
  2. बहुत बहुत खूब,सन्दीप भाई आपके भीतर तो एक श्रेष्ठ कवि विराजमान हैं,लिखते रहिएगा.... आपको बहुत बहुत शुभकामनाएं....

    ReplyDelete
  3. बातें एक शायर की तरह हू-ब-हू कर बैठा, ...
    उम्दा

    ReplyDelete
    Replies
    1. शुक्रिया प्रवीन भाई

      Delete

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