एक रोज़ मैं कलम से गुफ्तगू कर बैठा,
दबे दिल के जज़्बात उसके रूबरू कर बैठा।
मेरा हाल-ए-दिल उसने फिर लफ़्ज़ों को सुना दिया,
करके कानाफूसी उनसे एक अफसाना बना दिया।
और फिर आवाज़ देकर के कागज को भी पुकारा गया,
जज़्बातों से भरे मेरे लफ़्ज़ों को उस पर उतारा गया।
इतना कुछ हुआ जो लिखने की ज़ुस्तज़ु कर बैठा,
एक रोज़ मैं कलम से गुफ्तगू कर बैठा...
अब सोचता हूँ दबे रह जाते ये एहसासों के मोती,
बयाँ होता ना बहुत कुछ अगर ये पास ना होती।
बात बढ़ती गई और अब तो जैसे यारी सी हो गई,
मेरी ज़ुबाँ ही बन गई ये इस कदर प्यारी हो गई।
और अब मैं लिखता नहीं कलम चलाया करता हूं,
चढ़ाकर तीर लफ्जों के निशाने लगाया करता हूं।
बातें एक शायर की तरह हू-ब-हू कर बैठा,
एक रोज़ मैं कलम से गुफ्तगू कर बैठा,
दबे दिल के जज़्बात उसके रूबरू कर बैठा,
एक रोज़ मैं कलम से गुफ्तगू कर बैठा...
- संदीप सिंह -

Good one!
ReplyDelete🙏🙏thnx
DeleteWah ji wah kya baat hai
ReplyDeleteThank u🙏
DeleteWell written
ReplyDeleteThnx ji
Deleteबहुत खूब...
ReplyDeleteShukriya ji
DeleteKya khoob likha hai sir👏
ReplyDeletethank u mam
DeleteV Good. Keep it up.
ReplyDeleteThnx
DeleteWah Ji Wah 👍
ReplyDeleteThnx big bro
DeleteBAHUT BADIYA SIR
ReplyDeleteThnk u
DeleteNice veere
ReplyDeleteThnx
Deleteबहुत बहुत खूब,सन्दीप भाई आपके भीतर तो एक श्रेष्ठ कवि विराजमान हैं,लिखते रहिएगा.... आपको बहुत बहुत शुभकामनाएं....
ReplyDeleteबातें एक शायर की तरह हू-ब-हू कर बैठा, ...
ReplyDeleteउम्दा
शुक्रिया प्रवीन भाई
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