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आजकल...

चौतरफा किताबें हैं पर, मैं खुद को पढ़ रहा हूँ आजकल, बाहर किसी से नहीं, अंदर खुद से लड़ रहा हूँ आजकल, बहार आएगी, शाख फिर हरी होगी, फूल फिर खिलेंगे, क्या हुआ गर पतझड़ के पेड़ सा झड़ रहा हूँ आजकल। बुनियाद मजबूत रखी है मेरे बाप ने सब्र और हिम्मत की  तूफानों के आगे हर बार पर्वत सा खड़ रहा हूँ आजकल। शिखर छूने की चाह है मगर ज़मीन को भी भूलता नहीं, रोज़ एक कदम उम्मीद की सीढ़ी चढ़ रहा हूँ आजकल। रफ्तार खरगोश सी किस काम की जो मुकाम भटका दे, कछुए सा सही, मैं मंजिल की ओर बढ़ रहा हूँ आजकल। मुसीबतें आती है, झिंझोड़ के गिराती हैं हर बार फिर भी, मुसीबत के आगे खुद मुसीबत बन खड़ रहा हूँ आजकल। बातों का असर नहीं लेता, कि बनाकर पत्थर खुद को हौंसले के हथौड़े से नए रूप में गढ़ रहा हूँ आजकल। - संदीप सिंह -

ख्वाब तकिए के नीचे

अक्सर तकिये के नीचे, कुछ ख़्वाब चुपके से आते हैं, कुछ बेचैन करते हैं रात भर, कुछ चैन से सुलाते हैं, कुछ तंज कसते हैं मेरी नाकामियों पर बार-बार, और कुछ कामयाबियों पर मेरी पीठ थप-थपाते हैं, अक्सर तकिये के नीचे कुछ ख़्वाब चुपके से आते हैं... कुछ ख्वाब शहर में बैठे, मुझे गांव से जोड़ देते हैं, मुझे गांव की गलियों, मेरे खेतों में छोड़ देते हैं, मैं ख़ुशी से घूमता-फिरता, टहलता हूँ रात भर,  आँख खुलते ही सुबह वापिस शहर को मोड़ देते हैं, यूं मेरे साथ आँख-मिचौली छुप छुपके खेल जाते है, अक्सर तकिये के नीचे कुछ ख़्वाब चुपके से आते हैं... कुछ ख्वाब कभी दिल अज़ीज़ को बाहों में भर देते हैं, कुछ पल ही सही, अधुरी ख्वाहिशों को पूरा कर देते हैं, हर पल हर लम्हा हकीकत लगने लगता है मगर   अधूरे रह कर मुझको भी अधूरा कर देते है खुशियों के सैलाब तो कभी बन आंसु के तुपके से आते है अक्सर तकिये के नीचे कुछ ख़्वाब चुपके से आते हैं.... सोचता हूं इन ख्वाबों ने जरूर खुदा को भी सताया होगा दुनिया सजाने का शायद खुदा को ख्वाब ही आया होगा चांद, तारे, सूरज और धरती सब कुछ इकठ्ठा करके   अपने ख्वाबों को रूप देकर ...

वक़्त, बड़ा कमबख्त

जो वक़्त है ये,  बड़ा ही सख़्त है ये, बादशाह है बादशाहों का,  किसी की सुनता नहीं, बड़ा कम्बख़्त है ये। जो वक़्त है ये,  बड़ा ही सख्त है ये... कभी सदियों सा लम्बा, कभी ये लम्हा सा लगता है, कभी महफिल बन आए, तो कभी तन्हा सा लगता है, पंख नहीं है मगर फिर भी उड़ता ही जा रहा है, उम्र बुजुर्गों सी कभी, तो कभी नन्हा सा लगता है, खट्टे मीठे पलों के फलों से लदा एक दरख़्त है ये, जो वक़्त है ये,  बड़ा ही सख्त है ये... अपनी मस्ती से चलता सबको पीछे छोड़ चुका है, बड़े आए तीस मार खां, सबका गुरूर तोड़ चुका है, जो तू लापरवाह हुआ तो ये भी बेपरवाह बहुत है, उस्ताद है जनाब, अच्छे अच्छों के कान मरोड़ चुका है, मगर जिसने जान ली, पहचान ली कीमत इसकी, सिर पे बिठाए उसको, बस उसका ही भक्त है ये, जो वक़्त है ये,  बड़ा ही सख्त है ये, बड़ा कमबख्त है ये... - संदीप सिंह -

मेरे ख्यालात

कुछ बातों में आज भी पुराने ख्यालात रखता हूँ मैं, कि जो दिल में है, जुबां पे भी वही बात रखता हूँ मैं। फालतू की बातों से परहेज़ है बस और कुछ नहीं, लोग सोचते हैं गुरूर है, जो कम बात करता हूँ मैं। कौनसी बात, किसे बुरी लग जाए, क्या पता, इसलिए बोलते वक्त थोड़ी एहतियात रखता हूँ मैं। कोई जादूगर नहीं, सादा किसान का बेटा हूँ मगर, चंद दानों से लाखों उगाने की करामात रखता हूँ मैं। बड़ी गाड़ी बड़ा मकान बड़े ख्वाब हैं लेकिन, पुराने मकान की तस्वीर बटुए में साथ रखता हूँ मैं। लड़ने का शौक नहीं मगर कायर भी ना समझना मुझे, जिंदगी से हर रोज़ से दो दो हाथ करता हूँ मैं। महबूब सा बन कर मेरी, जवाब देती रहा कर बस, ऐ जिंदगी! जब कभी भी तुझसे सवालात करता हूँ मैं। - संदीप सिंह -

आदाब से हिसाब तक..

नज़र-ए-करम हम पर कुछ ऐसी जनाब कर गए पास से गुज़रे और झुकी आँखों से आदाब कर गए, चेहरा उनका लगा गा़लिब की कोई गज़ल सा मुझे, सामने आए तो लब खुद-ब-खुद इरशाद कर गए।  ये नदी यूँ ही नहीं मदहोश सी बल खाए जा रही है, होठों से छुआ है, वो उसके पानी को शराब कर गए।  मैं चला था ओर उनकी, हौंसला तूफानों सा लेकर, आँखों में डुबोकर, मुझ समंदर को तालाब कर गए।  ख्वाबों में ही सही, मगर हाथ में हाथ था उनका, जो मैं न कर सका, वो काम मेरे ख़्वाब कर गए। उनके चेहरे के आगे चाँद भी फीका सा पड़ रहा है, बाकमाल नूर है वो हर तारे को आफ़ताब कर गए।  शिकायत थी कि इंतज़ार बहुत करवाया उसने 'संदीप' पर एक मुलाक़ात में वो सालों का हिसाब कर गए। - संदीप सिंह -

बात कल रात की

कल रात की ही बात है, मैं जा कर बिस्तर पर लेटा था, वहीं साथ ही नटखट सा मेरा 5 साल का बेटा था। लेटे-लेटे जब बाजू को मैंने एक तरफ कर रख दिया, वो आकर पास लेटा और मेरी बाजू पर सर रख दिया। भोली-भाली सी बातें करता, मेरे साथ खेलता रहा, कभी कान-नाक, कभी दाढ़ी-मूछों को छेड़ता रहा। मस्ती करता जाने कब वो अपने ख्वाबों में खो गया, मेरे सीने पे हाथ, पेट पे टांग रख लिपट कर सो गया। तभी हू-ब-हू ऐसी ही ज़हन में एक पुरानी बात आ गई, इस बाप को भी कल रात अपने बाप की याद आ गई। यादों का सिलसिला चल पडा़ पुरानी कड़ियाँ खुलने लगी, बेटे की हर बात जैसे मुझसे और मेरे पापा से जुड़ने लगी। याद आया कि पापा के साथ मेरा ऐसे ही सोना होता था, बाजू पर सर होता था वही मेरा तकिया-बिछौना होता था। अब जब भी इसे बाइक पर अपने आगे बिठाता हूँ , तो खुद को पापा की साइकिल पर आगे बैठा पाता हूँ। किसी शाम हाथ थामे जब जाता हूँ शहर के हरे मैदानों में, महसूस होता है पापा के साथ हूँ गाँव के खेत-खलिहानों में। एक तसवीर भी दिखी हम तीनों की, मानो चार चाँद ...

बिन तेरे और तेरे साथ...

बिना तेरे किसी बेज़ान पत्थर सा पड़ा होता हूँ, और तुम साथ हो तो जैसे हीरे में जड़ा होता हूँ। मज़ा आता है लोगों के कलेजे जलते देखकर,  मैं जब भी महफ़िल में तुम्हारे साथ खड़ा होता हूँ।  तेरा रूठना कम्बख़त मौसम-ए-बहार भी पतझड़, और मैं पेड़ से किसी सूखे पत्ते सा झड़ा होता हूँ। एक तुम, जिसे हर बार जल्दी जाने की होती है, एक मैं, ''अभी न जाओ'' इसी ज़िद पे अड़ा होता हूँ। वो रात जब इन आँखों को दीदार नहीं होता तेरा, मैं पागल हर दफा मेरे ख्वाबों से लड़ा होता हूँ। बचाकर गर्म हवाओं से उसे रखता हूँ कुछ ऐसे, कि जो वो पानी हो तो मैं मिट्टी का घडा़ होता हूँ। -संदीप सिंह-

नशे दा कहर - Tragic Story of Many Families (Hindi/Punjabi)

बड़ा हो गया कुवेला (देर रात), हले घर नइयों आया, माड़े ओंदे ने ख्याल, जांदा दिल घबराया, बैठा सारा परिवार, ओहदी उड़ीक करी जावे, कित्थे-किवें होणा, पल-पल सोच मरी जावे।          बूहा (दरवाजा) पिट्टया किसे ने, बाहरों आवाज इक छड्डी,           ''ओ कोई खोलो दरवाजा'' कह के गाल (गाली) इक कड्डी,          कुंडा खोलया जो माँ ने, सामणे बुत्त जेहा खड़ा,           लै के बूहे दा सहारा, ओहदा पुत्त सीगा खड़ा।   नशे दा सी भार, खड़ा होया नी सी जा रिहा,  ओहनू वेख सबना दा, रोणा सीगा आ रिहा,  अक्खां खुली-बंद जेही, पैर धरती सी लब्ब (ढूंढ) रहे,   कदे उट्ठे  कदे   डिग्गे, बेबे-बापू ओहनू चक रहे।             औखा-सौखा होके, ठाके मंजे उत्ते पाया सी,           एह की कित्ता कहके, बापू छाती नाल लाया सी,          की कमी रही दस्स ,  ...

दुआ

ऐ ख़ुदा तेरी  रहमतों का कुछ ऐसा अंदाज़ रहे  मेरे दिल में हो फ़कीरी, बेशक़ सर पे ताज़ रहे  मुश्किलों से लड़ूं तुम बाज़ुओ को शेर कर दो  नज़र मंज़िल से न हटे इन आँखों में बाज़ रहे आने वाला कल भी, परसों बीता कल हो जायेगा  जी लूँ  जी भर ज़िंदगी जब तलक ये आज रहे कटे जुबाँ जो मेरे बोल दुखाएँ दिल किसी का मगर हक में सदा सबसे ऊँची मेरी आवाज़ रहे दुनिया लाख हो रुसवा मुझे परवाह नहीं कोई बस मेरे माँ-बाप ना कभी मुझसे नाराज़ रहे मिट्टी में दबूँ किसी के एहसान में दबने से पहले किसी बंदे का नहीं 'संदीप' सिर्फ तेरा मोहताज़ रहे  - संदीप सिंह -

बचपन का इतवार

सुकून वो पहले जैसा अब कहीं भी मेरे यार नहीं है  Sunday तो है पर मेरे बचपन का वो इतवार नहीं है एक गीत सुनने को आज Channel हजार हैं लेकिन  कमी सी खलती है कि वो "रंगोली", "चित्रहार" नहीं है  Sunday तो है पर मेरे बचपन का वो इतवार नहीं है... गलियां सूनी पड़ जाती, 9 बजते वक्त सा थम जाता चंद्रकांता देखने हर कोई टीवी के आगे जम जाता एक तरफ था बलू, बघीरा, उधर ताबाकी शेर खान  चड्डी पहन के फूल खिला था वो मोगली सबकी जान Tom & Jerry, Duck Tales, Micky Mouse  बड़ा ही प्यार था इन सबने मिलकर तब मेरा बचपन खूब संवारा था अलिफ लैला की कहानियों में हम सब कहीं खो जाते बेताल भूत को पकड़े विक्रम देख खड़े रोंगटे हो जाते  पहले जैसे इतने प्यारे अब यादगार किरदार नहीं है Sunday तो है पर मेरे बचपन का वो इतवार नहीं है   एक ख़बर को चीख चीख, ना पूरा दिन घुमाते थे 15 मिनट नजा़कत से तब ''समाचार'' सुनाते थे टी.वी जिसके घर होता वहाँ दौडे़ भागे जाते थे दूरदर्शन पर चक्रधारी जब ''श्री कृष्ण'' आते थे  ''रामायण'' और ''महाभारत'' जैसे अब संस्क...

कलम से गुफ्तगू

एक रोज़ मैं कलम से गुफ्तगू कर बैठा, दबे दिल के जज़्बात उसके रूबरू कर बैठा।                             मेरा हाल-ए-दिल उसने फिर लफ़्ज़ों को सुना दिया,                     करके कानाफूसी उनसे एक अफसाना बना दिया। और फिर आवाज़ देकर के कागज को भी पुकारा गया, जज़्बातों से भरे मेरे लफ़्ज़ों को उस पर उतारा गया।                      इतना कुछ हुआ जो लिखने की ज़ुस्तज़ु कर बैठा,                     एक रोज़ मैं कलम से गुफ्तगू कर बैठा... अब सोचता हूँ दबे रह जाते ये एहसासों के मोती,  बयाँ होता ना बहुत कुछ अगर ये पास ना होती।                    बात बढ़ती गई और अब तो जैसे यारी सी हो गई,            ...

10 दात्तां - Ten Blessings (Punjabi)

Hindi Version: देणा दे सकदा नहीं रब्बा, तेरी दित्ती होइयाँ दात्तां दा, मेरी सोच तों वड्डी दात तेरी, बड़ा छोटा मैं औकातां दा,  मेरी कलम चों लफ्ज़  वी मुक्क चल्ले, लग्गा  जिक्र करण सौगातां दा, अज्ज कोशिश है एह छोटी जई, दिल भरया मेरा जज़्बातां दा।  मेरा बापू पहली दात तेरी, जिहने तेरे वांग ही प्यार दित्ता, हड्ड साड़, लहू निचोड़ अपणा, मेरे सुपनयां नूं आकार दित्ता,  दुज्जी दात है मेरी माँ अमड़ी, जिहने धर्म कर्म संस्कार दित्ता,  मैंनू हसदा वसदा वेखन लई, अपणी सब खुशियां नूं वार दित्ता।  तिज्जी दात च  मिलया वीर वड्डा, जो नाल मेरे जिवें सज्जी बांह, इक पैण (बहन) है चौथी दात तेरी, मेरे लई जिवें ओह दुज्जी माँ, मेरे यार प्यारे दात पंजवी, तप्दी धरती लई ज्यों संगणी छां, मुँह रोज़ी ला, कम्म कार दित्ता, एह छेवीं दात जिथे किरत करां। किवें सत्त्वीं दात दा मुल्ल देवां, दुःख-सुख दा हाणी मिलाया तूँ, अट्ठवीं ते नौवीं दात दे विच, ती (बेटी) ते पुत्तर झोली पाया तूँ , दसवीं दात है तेरा नाम सच्चा, एह सच मैनु समझाया तूँ , एन्ना कुज बक्श निमाणे नूं, 10 दात्तां दा मालक बणाया तूँ। ...