चौतरफा किताबें हैं पर, मैं खुद को पढ़ रहा हूँ आजकल, बाहर किसी से नहीं, अंदर खुद से लड़ रहा हूँ आजकल, बहार आएगी, शाख फिर हरी होगी, फूल फिर खिलेंगे, क्या हुआ गर पतझड़ के पेड़ सा झड़ रहा हूँ आजकल। बुनियाद मजबूत रखी है मेरे बाप ने सब्र और हिम्मत की तूफानों के आगे हर बार पर्वत सा खड़ रहा हूँ आजकल। शिखर छूने की चाह है मगर ज़मीन को भी भूलता नहीं, रोज़ एक कदम उम्मीद की सीढ़ी चढ़ रहा हूँ आजकल। रफ्तार खरगोश सी किस काम की जो मुकाम भटका दे, कछुए सा सही, मैं मंजिल की ओर बढ़ रहा हूँ आजकल। मुसीबतें आती है, झिंझोड़ के गिराती हैं हर बार फिर भी, मुसीबत के आगे खुद मुसीबत बन खड़ रहा हूँ आजकल। बातों का असर नहीं लेता, कि बनाकर पत्थर खुद को हौंसले के हथौड़े से नए रूप में गढ़ रहा हूँ आजकल। - संदीप सिंह -