पहचान बनाओ तो खुद की मेहनत से,
खैरात से बने हस्ती, ये बात ठीक नहीं।
छोटे घर को महज़ बड़ा मकान बनाने को,
उजाड़ दो कोई बस्ती, ये बात ठीक नहीं।
रिश्तों में ज़बरदस्ती, ये बात ठीक नहीं।
समंदर डुबा दे, गम नहीं, ये हक है उसका,
साहिल पे डूबे कश्ती, ये बात ठीक नहीं।
दिल बहलाने को ज़माने में चीजें बहुत हैं लेकिन,
किसी मजबूर से करो मस्ती, ये बात ठीक नहीं।
शौंक बड़े ठीक हैं, पर दिल भी तो बड़ा रखो,
बातें महंगी, नीयत सस्ती, ये बात ठीक नहीं।
माना कि मोहब्बत में दूरियों का भी मजा है पर,
सावन में रहें आंखे बरसती, ये बात ठीक नहीं।
हकीक़त में भी मिलो, बैठो, बातें करो ’संदीप’,
यूं ख्वाबों में मटरगशती, ये बात ठीक नहीं।
– संदीप सिंह –
Wah
ReplyDeleteBahut sundar Sandeep gi
ReplyDeleteBahut sundar ☀️ likha h
ReplyDeleteBhut hee achi soch h
God bless you 👍
Beautifully written.. Nice thoughts 👍
ReplyDeleteBot vadiya
ReplyDeleteVadiya ji
ReplyDeleteWonderful emotions ⭐❣️⭐
ReplyDeleteबहुत खूब
ReplyDeleteAwesome lines 👏. Keep it up.
ReplyDeleteVery nice
ReplyDeleteAwesome
ReplyDeleteAmazing. Wonderful
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