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ख्वाब देखा है मैंने

सब्र रखने का दम गरीब में बेहिसाब देखा है मैंने,
पैसे वाले की नीयत को होते खराब देखा है मैंने,

माना औकात छोटी है, जितना हो सके काम आया हूं,
औकात वालों के मुंह पे तो साफ जवाब देखा है मैंने।

सिर्फ मंगल, वीर को छूने से पाप लगता है जिनको,
बाकी पाँचो दिन उनके हाथों में शराब देखा है मैंने।

बालों में सजा था किसी के जो ताज बन कर कभी,
पत्ती पत्ती बिखरा वो सूखा गुलाब देखा है मैंने।

बुजुर्गों से कसीदे सुनते आये जिस गुलसिताँ के बारे,
टुकड़े टुकड़े होते वो देश पंजाब देखा है मैंने।

जंग सिर्फ मैदान में नहीं कागज़ पर भी लड़ी जाती है, 
कलम को तलवार, ढाल बनते किताब देखा है मैंने।

तानाशाह सरकार घुटने टेकने को मजबूर हुई आखिर
वजूद की खातिर किसानों का ऐसा इंकलाब देखा है मैंने।

कुछ ऐसा लिख दे संदीप जो दिलों पे छाप छोड़ दे,  
 मुकम्मल हो खुदा जो ये ख्वाब देखा है मैंने।


–संदीप सिंह–

Comments

  1. बहुत सुन्दर संदीप जी

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  2. Nice 👌🏻👌🏻👍👍

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  3. तेरा लिखना लाजवाब देखा मैंने

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  4. Bahut badiya 👏👏

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  5. Bhut khub ..Sandeep keep on writing. I see honesty in words.

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  6. शांत रहता है जो हरदम उस 'संदीप' के, मन के भावों को...
    कलम के ज़रिए काग़ज़ पर तूफ़ान बनता देखा है मैंने...

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  7. बहुत बहुत शुक्रिया, आप लोग हर बार कुछ नया लिखने को प्रोत्साहित करते है🙏

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