बचपन में एक रोज़ जब मैं घर की छत पे चढ़ बैठा,
कागज़ की उड़ती चिड़िया देख विचार दिल में गड़ बैठा,
कि कैसे डोर से बंधा एक कागज़ हवा में उड़े जा रहा है,
धरती पे बैठे जैसे आसमान से कोई तार जुड़े जा रहा है,
भागा गया बड़े भाई के पास, मेरी भी पतंग बना दो ना
वो बोला बाद में, मैने जिद्द की, आज ही सिखा दो ना
फिर अलमारी से अखबार और झाड़ू से सींखे निकाली,
कीकर के पेड़ से गोंद लेकर, अखबार पे सीँखे चिपकाली,
मां की सिलाई मशीन से रील लेकर डोरी लगाई हमने,
बड़े लाड़ से वो बचपन की पहली पतंग बनाई हमने,
भाई ने पकड़ी डोरी तो कन्नी देकर हवा में उछाला मैने,
इक बार तो छत से गिरते गिरते खुद को संभाला मैने।
हाथों से छूटते ही मानो हवा ने गोद में उठा लिया उसे,
झूला सा झूलाती, लहराती, आसमान में उड़ा दिया उसे,
डोर जब मैने पकड़ी तब खुशी से न समा रहा था मैं,
पायलट जैसा एहसास था, कोई जहाज उड़ा रहा था मैं,
पर ज्यादा देर न हुई कि मेरी खुशियों को लगा एक झटका,
गली का शातिर पतंगबाज भी अपनी छत पे आ धमका।
बड़ी तेजी से अपनी पतंग आसमान में चढ़ा दी उसने,
मेरी काटने के इरादे से पतंग इस ओर बढ़ा दी उसने,
ये सब देख मैं भाई को और भाई मुझको निहारने लगा,
मैं डोर समेटूं तेजी से, भाई पतंग नीचे उतारने लगा,
बचाने के लिए हम दोनो ने एडी चोटी का जोर लगा दिया,
पर कच्ची रील पे आखिर उसने कांच का डोर चला दिया।
यकायक अपनी खुशियों को मैं अब सिमटते देख रहा था,
हाथ में टूटी डोर लिए बस पतंग को गिरते देख रहा था,
तेज हवा उसे उड़ाकर गांव के दूसरे छोर ले जा रही थी,
मैं भी पीछे पीछे भाग पड़ा वो जिस ओर जा रही थी,
आखिर हवा गांव के बाहर वाले मंदिर में उसे पटक गई,
देखा तो पतंग पास बड़े से पीपल के पेड़ पे अटक गई।
ढूंढ कर उसे मैं खुशी से बंदर सा पेड़ पर चढ़ने लगा,
घर जाकर फिर उड़ाऊंगा सोच पतंग की ओर बढ़ने लगा,
नज़रें ऐसी टिकी कि दिखा ना मक्खियों का छत्ता मुझे,
हाथ टकराया, लड़ी हाथ मुंह पे, तब जाके लगा पता मुझे,
पहुंचने ही वाला था हाथ मगर वही छोड़ नीचे आना पड़ा,
डंक से ज्यादा पतंग का दर्द था पर दिल समझाना पड़ा।
घर पहुंचा तो मेरी हालत देख घबराई मां, दादी और बुआ,
कोई आचार तो कोई लोहा मले पूछे ये क्या कैसे हुआ,
मूंह सूज गया इतना कि आंखे अंदर धंसी दिख रही थी,
पर मुझे तो दर्द में भी पतंग पीपल पे फंसी दिख रही थी।
–संदीप सिंह–
सारा दृश्य आंखो के सामने घटित होता सा प्रतीत हो रहा है। कमाल हैं sir आप 👏👏👏
ReplyDeleteनिशब्द 👌👌👌👌
ReplyDeleteBachpan ke din bhe kya din the .Lovely poem.
ReplyDeleteBachapan ki yaade
ReplyDeleteVery nice 👍
Beautiful story!
ReplyDeleteGud...keep it up
ReplyDeleteZABARDAST
ReplyDeleteRemembering childhood memories
ReplyDeleteबहुत बहुत शुक्रिया आप सभी का
ReplyDeleteWah wah wah..aise lag rha tha padhte hue jaise koi movie ka song chal raha ho aur sab scene ek ek karke dikhte chale gaye.... khoobsurat rachna...keep it up bro🤗🤗🤗
ReplyDeleteVery good
ReplyDelete੍
ReplyDelete,nic bro
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