नज़र-ए-करम हम पर कुछ ऐसी जनाब कर गए
पास से गुज़रे और झुकी आँखों से आदाब कर गए,
चेहरा उनका लगा गा़लिब की कोई गज़ल सा मुझे,
सामने आए तो लब खुद-ब-खुद इरशाद कर गए।
ये नदी यूँ ही नहीं मदहोश सी बल खाए जा रही है,
होठों से छुआ है, वो उसके पानी को शराब कर गए।
मैं चला था ओर उनकी, हौंसला तूफानों सा लेकर,
आँखों में डुबोकर, मुझ समंदर को तालाब कर गए।
ख्वाबों में ही सही, मगर हाथ में हाथ था उनका,
जो मैं न कर सका, वो काम मेरे ख़्वाब कर गए।
उनके चेहरे के आगे चाँद भी फीका सा पड़ रहा है,
बाकमाल नूर है वो हर तारे को आफ़ताब कर गए।
शिकायत थी कि इंतज़ार बहुत करवाया उसने 'संदीप'
पर एक मुलाक़ात में वो सालों का हिसाब कर गए।
- संदीप सिंह -
Nyc 👌👌👌👌
ReplyDelete👌🏼👌🏼👌🏼👍👍👍
ReplyDeleteIncredible
ReplyDeleteवाह जी वाह, आप शब्दों से आबाद कर गए।
ReplyDeleteBahut sundar bhai
ReplyDeleteबहुत खूब
ReplyDeleteawesome
ReplyDeleteगजब। 👍👍
ReplyDeleteवाह क्या बात बहुत खूब
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