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यह कैसा दौर है...


क्या दौर है जनाब, क्या क्या सामान बिक रहा है,

ज़मीर बिक रहा है, ईमान बिक रहा है।

सब कुछ यहाँ बिकाऊ, कीमत सही लगाओ, 

चंद सिक्कों की खातिर इन्सान बिक रहा है।।


मर कर दो गज़ के मालिक बने थे जो बमुश्किल,

वो मुर्दे हैराँ हैं कि उनका शमशान बिक रहा है।

हर रोज़ धर्म की नई, एक दुकान खुल रही है, 

लेलो कि सस्ते दाम में भगवान बिक रहा है।।


उस मुल्क की हिफाज़त खुदा भी न कर सकेगा, 

जिस मुल्क की सरहद का निगेहबान बिक रहा है। 

जिस मेज़ पर तिरंगा, उसी मेज़ के नीचे से, 

अपनों के हाथों मेरा भारत महान बिक रहा है।। 


अरबों का कर्जा खाकर, साहेब बैठे विदेश जाकर,

यहां चंद हजार कर्जे में रोज़ किसान बिक रहा है।

धूप, ठंड, बारिश, झेल कर उगाये फिर भी,

रो-रो के उसका गेहूँ, मक्का, धान बिक रहा है।।

 - संदीप सिंह -

Comments

  1. Bahut hi heart touching aur reality pe based bhai

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  2. Wow deep kya kahun am speachless itna achha or suchha likha hai 👌👌 jabardast waah👏👏👏👏👏👏👏👏

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  3. This is the reality of this era. True Lines👌

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  4. Wahhh....right.

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  5. True and well described 👌👌

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  6. Bahut badiya bhai gi

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  7. Very good sir

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