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तेरे रहनुमाँ बहुत हैं


माना कि शहर में तेरे रहनुमाँ बहुत  हैं, 

फिक्रमंद कम हैं और खामखां बहुत हैं


पहरेदारी की फ़िक्र ना कर, ये सब पे नजर रखते हैं

तुझे खुद खबर नहीं ये तेरी कितनी खबर रखते हैं

खुद के गम से नहीं ये तेरी हसीं से परेशाँ बहुत हैं

माना कि शहर में तेरे रहनुमाँ बहुत  हैं

 

                नसीहत ना चाह कर लोगे, मुफ्त के कर्ज़दार बनोगे,

                मिला लो हाँ में हाँ इनकी, तो तुम समझदार बनोगे,

                सुनोगे दिल की तो कहेंगे, अरे तू नादाँ बहुत हैं, 

                माना कि शहर में तेरे रहनुमाँ बहुत  हैं


रहोगे जब तलक ख़ामोश इस शराफ़त के मकाँ अंदर, 

गिरेंगी बिजलियाँ यूँ ही इस आफ़त के मकाँ अंदर,

अपनी चालाकियोँ पर इन्हें गुमाँ बहुत हैं,

माना कि शहर में तेरे रहनुमाँ बहुत  हैं,

फिक्रमंद कम हैं और खामखां बहुत हैं 



- संदीप सिंह -

Comments

  1. The hidden message is so meaningful and required

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  2. One of the bitter truths of life
    Very good composition sir

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  3. You are strong with your 🖊️🖊️

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  4. Very true. Nicely written poem. Well done.

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  5. मैं आपका हूँ फिक्रमंद...,. बहुत बहुत बहुत खूब

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