बिना तेरे किसी बेज़ान पत्थर सा पड़ा होता हूँ, और तुम साथ हो तो जैसे हीरे में जड़ा होता हूँ। मज़ा आता है लोगों के कलेजे जलते देखकर, मैं जब भी महफ़िल में तुम्हारे साथ खड़ा होता हूँ। तेरा रूठना कम्बख़त मौसम-ए-बहार भी पतझड़, और मैं पेड़ से किसी सूखे पत्ते सा झड़ा होता हूँ। एक तुम, जिसे हर बार जल्दी जाने की होती है, एक मैं, ''अभी न जाओ'' इसी ज़िद पे अड़ा होता हूँ। वो रात जब इन आँखों को दीदार नहीं होता तेरा, मैं पागल हर दफा मेरे ख्वाबों से लड़ा होता हूँ। बचाकर गर्म हवाओं से उसे रखता हूँ कुछ ऐसे, कि जो वो पानी हो तो मैं मिट्टी का घडा़ होता हूँ। -संदीप सिंह-